विकास का अर्थ है खुद को समझदारी से इस्तेमाल करना
विकास को अक्सर अधिक सीखने और अधिक क्षमताएँ हासिल करने के रूप में देखा जाता है।
लेकिन जीवन में महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि हम कितना जानते हैं, बल्कि यह कि जो हम जानते हैं उसे वास्तविकता में कैसे इस्तेमाल करते हैं।
क्या सही है यह जानते हुए भी वही चुनाव दोहराया जा सकता है। क्या करना चाहिए यह समझते हुए भी, असली परिस्थिति में पुरानी ही प्रतिक्रिया दोहराई जा सकती है।
केवल जान लेने से जीवन नहीं बदलता।
यदि ज्ञान किसी सिद्धांत या तरीके को समझना है, तो बुद्धिमत्ता उस समझ को आज की वास्तविकता के अनुसार इस्तेमाल करने की क्षमता है।
इसे तीरंदाज़ी से समझें — ज्ञान है धनुष चलाने का सिद्धांत जानना, और बुद्धिमत्ता है दूरी, हवा और अपनी स्थिति को परखकर वास्तव में निशाने पर लगाना।
धनुष चलाने का तरीका वही रहता है, पर हालात हर बार बदल जाते हैं।
हवा की दिशा बदलती है, निशाने की दूरी बदलती है, और धनुष थामने वाले की साँस और ताकत भी बदलती है।
इसलिए निशाना लगाने के लिए सीखे हुए तरीके को ज्यों का त्यों दोहराना काफ़ी नहीं होता।
अभी क्या बदला है यह देखना ज़रूरी है, और उसी के अनुसार ताकत और दिशा को समायोजित करना होता है।
जीवन भी इससे अलग नहीं है।
समय के साथ परिवेश और रिश्ते बदलते हैं। जो भूमिका और ज़िम्मेदारी हम निभा रहे हैं वह भी बदलती है। जो तरीका कल तक हमें सुरक्षित रखता था, वह आज राह रोक सकता है, और जो चुनाव कभी कारगर था, वह अब उतना सही न रहे।
समझदारी से जीने का अर्थ हर परिस्थिति में एक ही जवाब लागू करना नहीं है।
इसका अर्थ है बदली हुई परिस्थिति को पहचानना और उसी के अनुसार अपना नज़रिया और तरीका समायोजित करना।
पर बदलाव का मतलब यह नहीं कि सब कुछ बदल देना ज़रूरी है।
हमारे भीतर कुछ हिस्से समय के साथ बदलते हैं, और कुछ हिस्से अलग-अलग परिस्थितियों में भी बार-बार लौटते हैं।
भावनाएँ, विचार, इच्छाएँ और लक्ष्य बदल सकते हैं। वहीं जिस तरह हम सहज रूप से प्रतिक्रिया देते हैं, रिश्तों में जो भूमिका बार-बार निभाते हैं, और जिन मूल्यों व जीवन-दिशा को आसानी से नहीं छोड़ पाते, वे अक्सर लंबे समय तक बने रहते हैं।
बुद्धिमत्ता की शुरुआत इन दोनों के बीच फ़र्क पहचानने से होती है।
यह देखना कि क्या मौजूदा परिस्थिति के कारण बदला है, और क्या लंबे समय से चला आ रहा अपना पैटर्न है।
सब कुछ को न बदलने वाला स्वभाव मान लेने पर हम अतीत के अपने रूप में क़ैद हो जाते हैं, और सब कुछ बदला जा सकता है मान लेने पर अपना केंद्र खो देते हैं।
खुद को जानना, खुद को किसी एक स्वभाव या कुछ गिनी-चुनी विशेषताओं में समेटना नहीं है।
यह बदलते हुए रूप और दोहराए जाने वाले रूप, दोनों को एक साथ देखना है।
यह जानना है कि किन परिस्थितियों में मन डगमगाता है, किन चुनावों के सामने वही प्रतिक्रिया दोहराई जाती है, कब हम खुद जैसा महसूस करते हैं और कब अपने केंद्र से दूर हो जाते हैं।
यह समझ जितनी गहरी होती जाती है, हम खुद को उतनी ही समझदारी से इस्तेमाल कर पाते हैं।
विकास का अर्थ बिल्कुल अलग इंसान बन जाना नहीं है।
यह खुद के भीतर गहराई से झाँकना है, बदलते हुए और लंबे समय तक बने रहने वाले हिस्सों को पहचानना है, और हर समय के जीवन के अनुसार खुद को इस्तेमाल करना सीखना है।
अगर हवा बदल गई है, तो धनुष की दिशा समायोजित करनी होगी।
पर यह भूलना नहीं चाहिए कि तीर किस ओर छोड़ा जा रहा है।
विकास का अर्थ बिना सोचे आगे बढ़ते जाना नहीं है, बल्कि बदलते समय के बीच भी अपना केंद्र बनाए रखते हुए, थोड़ा और समझदारी से जीवन को चुनना है।
क्या अभी हमें ज़्यादा ज्ञान की ज़रूरत है?
या पहले से जाने हुए को अलग ढंग से इस्तेमाल करने वाली बुद्धिमत्ता की?
